Wednesday, February 22, 2012

यह स्वर्ग है, यही नरक है
बस नाम मात्र का फर्क है
गाहे-बगाहे के बाकी तर्क है
जो चमक गया वो अर्क है
जो फिसल गया वो गर्क है


तन्हाई ने एक दिन
मुझसे चुपके से यूं कहा,
दिल तुम्हारा आजकल
ऐसे क्यों धडक रहा ?
अपनी धडकनों से तुम कुछ क्यों नहीं कहते,
हंसी-खुशी वो चुपचाप शान्त क्यों नहीं रहते ?
मैं तो अब भी हुँ तुम्हारे साथ
यूँ ही कसकर थामे रखो मेरा हाथ ।



मानवता आज बैठी है हारी

जग का आधार जिसे वेद मानते
फिर क्यों हम उसको तुच्छ जानते?
जीवन फूल उपजता जिससे, जग में नारी ही तो वह क्यारी
मानवता आज बैठी है हारी



कभी तिनके, कभी पत्ते, कभी ख़ुश्बू उड़ा लाई
हमारे घर तो आंधी भी कभी तनहा नहीं आई

लचकती डाल को ही सबने लचकाया है इस जग में
सबब टहनी के झुकने का ये दुनिया कब समझ पाई

अजब फ़नकार है, गढ़ता है शक्लें सैकड़ों हर दिन
मगर सूरत कभी कोई किसी से कब है टकराई

किसी के मानने, ना मानने से कुछ नहीं होता
उसी का नूर है सब में, उसी की सब में रानाई

!! राम राम !!

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