Saturday, December 24, 2011

हे कृष्ण हे कन्हाई..........

हे कृष्ण हे कन्हाई, मुझे याद तेरी आई
बदरी गम की छाई, दूँ किसकी मैं दुहाई
तेरा नाम है कन्हैया, तारे तू सबकी नैया
बन जाओ तुम खेवैया, अटकी है मेरी नैया
मझधार में पड़ी है, लहरें है तेज़ आई .. हे कृष्ण हे कन्हाई...
नृप क्रोध ब्रज बचाया, गज ग्राह से छुड़ाया
मथूरा में कंस मारा, असुरों को भी संघारा
ऋषियों के कष्ट काटे, बारी हमारी आई... हे कृष्ण हे कन्हाई.....


मैं तुफान हूँ, इसलिये मुश्किलों से अंजान हूँ
मैं हिम्मत हूँ, सोच हूँ, बुलंद हूँ, बेजोड हूँ
मैं हारकर भी जीतने के ज्जबों से भरपूर हूँ
मैं कोशिश हूँ, निरंतर हूँ, इसलिये कामयाब हूँ।।"
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किस्मत दूसरा मौका नहीं देती ,
दुनिया अनजाने को पनाह नहीं देती ,
जिंदगी से ज्यादा प्यार मत करो ,
क्योकि मौत कभी ""रिश्वत"" नहीं लेती

ज़िन्दगी क्या है ?
ज़िन्दगी ऐसा क्यों है..?
ज़िन्दगी आखिर चाहती क्या है..?
खाली मुट्ठी में आसमां को बंद करने की चाहत जहाँ हमें हर हद को पार करने की ताकत देती है वहीँ जब मुट्ठी भर जाए तो फिर रेत की तरह फिसलते वक़्त को पकड़ने की छटपटाहट भी चैन नहीं लेने देती है और फिर हम भागते हैं , भागते ही जाते हैं बिना ये देखे की हमारे इस दौड़ में हम किसे पीछे छोड़ रहे हैं , कौन हमारे साथ दौड़ते-दौड़ते अपना दम तोड़ रहा हैं , एक लम्बे अन्तराल की खाई में हर रिश्ता गुम होता जा रहा है , हम सब सिमटते जा रहे हैं इस हद तक की हम बौना होते जा रहे हैं..हमारा अस्तित्व मिटते जा रहा है ! सालों -साल हम अपनों से मिल नहीं पाते, अपनों की खबर लिए बिना जीये जा रहे हैं
आखिर हम कहाँ आ गए हैं ?

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