Friday, February 15, 2013

फिर वसंत की

फिर वसंत की आत्मा आई,
मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण,
अभिवादन करता भू का मन !
दीप्त दिशाओं के वातायन,
प्रीति सांस-सा मलय समीरण,
चंचल नील, नवल भू यौवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,
आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण,
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
स्वागत बसंत!!!!!!!!!!!!!!


फिर वसंत की आत्मा आई,
मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण,
अभिवादन करता भू का मन !
दीप्त दिशाओं के वातायन,
प्रीति सांस-सा मलय समीरण,
... चंचल नील, नवल भू यौवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,
आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण,
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
स्वागत बसंत!!!!!!!!!!!!!!



तुम्हारा पहली मै हो नहीं सकी,

वक़्त ने साथ नहीं दिया,

दूसरी, तीसरी, या चौथी ...

मै होना नहीं चाहती,

आखिरी होने का प्रस्ताव रखती हूँ,

... कोई जल्दी नहीं ...
जब तुम्हारा दिल,
इस दुनिया की हर शय से भर जाये,
और जीने की कोई वजह ना हो,
तो मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लेना !!!
तुम्हारे इंतज़ार में ......................

प्रस्ताव दिन की शुभकामनायें .......


मैं कुछ बेहतर ढूँढ़ रहा हूँ
घर में हूँ घर ढूँढ़ रहा हूँ

घर की दीवारों के नीचे
नींव का पत्थर ढूँढ़ रहा हूँ
...
जाने किसकी गरदन पर है
मैं अपना सर ढूँढ़ रहा हूँ

हाथों में पैराहन थामे
अपना पैकर ढूँढ़ रहा हूँ

मेरे क़द के साथ बढ़े जो
ऐसी चादर ढूँढ़ रहा हूँ..

प्रयत्न ....
 

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