अपने पत्ते खोल
मैं भी अपनी गठरी खोलूँ तू भी अपनी गाठें खोले
बाद की बातें बाद में होंगी पहले दिल की बात तो होले
कितना रिश्ता कितनी दूरी कितनी गाढ़ी है मजबूरी,
आगा-पीछा सोच-सोच के मौसम अपने पत्ते खोले
बाद की बातें बाद में होंगी पहले दिल की बात तो होले
कितना रिश्ता कितनी दूरी कितनी गाढ़ी है मजबूरी,
आगा-पीछा सोच-सोच के मौसम अपने पत्ते खोले
अवनी पर चातक प्यासे हैं
अम्बर में चपला प्यासी है,
किसकी प्यास बुझाए बादल
ये याचक हैं, वह दासी है
बनो तृप्ति बन सको अगर तुम लेकिन मुझसे यह मत पूछो,
कितनी प्यास बुझा लाए हो कितनी असफल शेष रह गई ?

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