पिता (दोस्त से)- मेरे 4 बच्चे हैं, 3 ने एमबीए किया है और एक चोर है।
दोस्त- जो चोरियां करता है उसे घर से निकाल क्यों नही देते?
पिता- एक वही तो कमा कर लाता है..
Kailash Bagaria
कौन है कितने पानी में, सबको एहसास करा देंगे....
जो ख़ुद को ख़ुदा समझते हैं, उनको हम धूल चटा देंगे...
तुम देखते रहना ऐ ज़ालिम ! इक दिन ऐसा भी आएगा..
हम अपने जिस्म की गरमी से, ज़ंजीरों को पिघला देंगे..............
कारवां तो कोई न था हमारे साथ,ज़िंदगी के सफ़र में अकेले थे हम,
रास्ते में कुछ दोस्त जुड़ते चले थे,आज एक मुकाम पर पलटकर देखता हूँ,
तो वो नामुराद कितने मगरूर थे,हवा में उड़ते हुए मेरे गरूर की,
डोर काटी न थी कभी उन्होंने,हमेशा काटा था कन्नों से उन्होंने |
डोर तो हमेशा दुश्मन ही काटता है,कन्ने से काटकर था समझाया उन्होंने,
बहुत हवा में हमसे मत उड़ो, पतंग उतार कर कन्ने फिर से बाँध लो ......
Arun Garg
क्षमा करो मां भारती हमें,
हम बहुत शर्मिंदा हैं,
तुझको घायल करके वो अभी तक क्यों जिन्दा हैं,
जिन्दा हैं वो सभी दरिन्दे,
घूम रहे है शान से,
... करते रहते खिलवाड़ हमेशा,
जो तुम्हारी आन से.....
सहमा है गणतंत्र हमारा,
तिरंगा है डरा हुआ,
रक्षक ही भक्षक बने है,
स्वाभिमान है मरा हुआ,
********सो मैं भी अब कसाब बनना चाहता हूँ ||***********
वो आतंकवादी है पाकिस्तानी , पर सरकारी दामाद है
मैं सच्चा हिन्दुस्तानी हूँ , पर घर से निकलते ही, आतंकवादी समझा जाता हूँ
वो खून कर के , खुले आम, मौज मना रहा है, सरकार की मेहरबानी से |
मैं अपने ही मुल्क में , सरकार से डर - डर के जीवन बिताता हूँ
बेगुनाहों के खून से रंगे है उसके हाथ , फिर भी मिल रहा है उसे "हाथ" का भरपूर साथ |
यही "हाथ" भारी पड़ा है, मेरे सर पर मेरी जेब पर , मैं बेवजह ही "हाथ" पर मोहर लगाता हूँ
छोटी छोटी बातें करके
बडे कहां हो जाओगे
पतली गलियों से निकलो तो
खुली सडक पर आओगे
------बसीम बरेलबी
मतलब की सब दोस्ती देख लिया सौ बार।
काम बनाकर हो गया, जिगरी दोस्त फ़रार।
रमानाथ अवस्थी
जरा भी जरुरी नहीँ है । समर्पण पर्याप्त है । अपने चित्त को पहचानो । कुछ भी थोपना आवश्यक नहीँ है । चित्त जैसा हो उसी चित्त के सहारे परमात्मा तक पहूंचो ।
परमात्मा तक स्त्रैण चित्त पहूंच जाते हैँ, पुरुष - चित्त पहुंच जाते हैँ । परमात्मा तक तुम जहां हो, वहीँ से पहुंचने का उपाय है; बदलने की कोई जरूरत नहीँ है । और बदलने की झंझट मेँ तुम पड़ना मत, क्योँकि बदल तुम पाओगे न । अगर तुम्हारा चित्त भावपूर्ण है त...ो तुम लाख उपाय करो, तुम उसे संकल्प से न भर पाओगे । अगर तुम्हारा चित्त हृदय से भरा है तो तुम बुद्धि का आयोजन न कर पाओगे । जरूरत भी नहीँ है । ऐसी उलझन मेँ पड़ना भी मत । अन्यथा तुम जो हो, वह भी न रह पाओगे; और तुम जो होना चाहते हो वह तो तुम हो न सकोगे ।गुलाब का फूल गुलाब के फूल की तरह ही चढ़ेगा प्रभु के चरणोँ मेँ । कमल का फूल कमल के फूल की तरह चढ़ेगा । तुम जैसे हो वैसे ही स्वीकार हो । तुम जैसे हो वैसा ही प्रभु ने तुम्हेँ बनाया । तुम जैसे हो वैसा ही प्रभु ने तुम्हेँ चाहा । तुम अन्पथा होने की चेष्टा मेँ विकृत मत हो जाना, क्षत - विक्षत मत हो जाना
अगर तुम्हेँ लगता है कि स्त्रैण-चित्त है तुम्हारे पास - शुभ है, मंगल है । पुरुष-चित्त का कोई अपने -आप मेँ मूल्य नहीँ । हो तो वह भी शुभ है, वह भी मंगल है । परमात्मा ने दो ही तरह के चित्त बनाएः स्त्रैण और पुरुष ; संकल्प और समर्पण । दो ही मार्ग हैँ उस तक जाने के । तुम जहां हो वहीँ से चलो । तुम जैसे हो वैसे ही चलो । प्रभु तुम्हेँ वैसा ही अंगीकार करेगा ।

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